अजय ब्लॉग-अनुभव और अभिव्यक्ति

“अनुभव, विचार और कहानियों का संगम”

  • ✍️ डा.अजय कुमार सिंह


    🌾 प्रस्तावना

    मानव सभ्यता की यात्रा उत्पादन के साथ शुरू हुई — बीज बोने से लेकर मशीन चलाने तक। किंतु जब से मनुष्य ने अपनी जरूरत से अधिक उत्पादन करना शुरू किया, तभी से “उत्पादन अधिशेष” (Surplus Production) की कहानी शुरू हुई।
    यही अधिशेष समाज के विकास का आधार भी बना और संघर्ष का कारण भी।


    ⚙️ उत्पादन अधिशेष क्या है?

    जब कोई समाज अपनी मूलभूत जरूरतों — जैसे भोजन, वस्त्र, आश्रय आदि — से अधिक उत्पादन करने लगता है, तो उस अतिरिक्त हिस्से को उत्पादन अधिशेष कहा जाता है।
    यह अधिशेष ही व्यापार, कर, पूंजी संचय और सत्ता की नींव बनता है।
    पर सवाल यह है कि — इस अधिशेष का मालिक कौन?


    ⚖️ संघर्ष की जड़ : अधिशेष पर अधिकार

    इतिहास बताता है कि सभ्यताओं के विकास के साथ-साथ यह प्रश्न गहराता गया —
    “जो उत्पादन करता है, वही उसका स्वामी क्यों नहीं होता?”

    • किसान अनाज उगाता है, पर अनाज का मूल्य बाजार तय करता है।
    • मजदूर फैक्ट्री में श्रम करता है, पर मुनाफा पूंजीपति ले जाता है।
    • संसाधन जनता के होते हैं, पर उनका उपयोग नीति-निर्माता तय करते हैं।

    यही विरोधाभास उत्पादन अधिशेष के संघर्ष की जड़ है।


    💰 पूंजीवाद और अधिशेष का केंद्रीकरण

    औद्योगिक क्रांति के बाद यह संघर्ष और तीव्र हुआ।
    मशीनों ने उत्पादन को कई गुना बढ़ाया, लेकिन अधिशेष का बड़ा हिस्सा पूंजीपति वर्ग के हाथों में सिमट गया।
    मजदूर वर्ग केवल “वेतन” के रूप में अपनी जीविका भर पाता रहा, जबकि शेष लाभ — यानी अधिशेष — मालिक की तिजोरी में जाता रहा।

    यह वही समय था जब मार्क्स ने कहा —

    “पूंजी, श्रम के शोषण से उत्पन्न अधिशेष मूल्य का संचय है।”


    🧑‍🌾 भारत का संदर्भ

    भारतीय कृषि व्यवस्था में भी यही विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है।
    किसान अपनी जमीन, पसीने और समय का निवेश करता है, पर उसका लाभ बिचौलिये, व्यापारी और बड़ी कंपनियाँ उठा लेती हैं।
    उत्पादन अधिशेष का मूल्य किसान के हाथ में नहीं, बाजार के हाथ में होता है।

    ग्रामीण भारत में यह संघर्ष आज भी जीवित है —
    एक ओर उत्पादन है, दूसरी ओर मूल्यहीनता।


    🌍 वैश्विक परिप्रेक्ष्य

    आज विश्व अर्थव्यवस्था “उत्पादन अधिशेष” पर टिकी है।
    जो देश अधिक उत्पादन करते हैं, वे शक्ति संपन्न कहलाते हैं।
    जो देश उपभोग करते हैं, वे ऋणग्रस्त और आश्रित बनते जाते हैं।
    परंतु विकास की इस दौड़ में प्रकृति और मानव — दोनों ही शोषित हो रहे हैं।

    अधिशेष बढ़ा है, पर संतुलन घटा है।


    🕊️ समाधान : संतुलन और न्याय

    उत्पादन अधिशेष का संघर्ष तभी समाप्त हो सकता है जब —

    1. उत्पादक को उचित मूल्य मिले
    2. अधिशेष का न्यायपूर्ण वितरण हो
    3. संसाधनों का उपयोग सतत् और संतुलित रूप से किया जाए
    4. नीति और नैतिकता का समन्वय हो

    विकास तभी सार्थक है जब वह सबके श्रम का सम्मान करे।


    ✨ निष्कर्ष

    “उत्पादन अधिशेष का संघर्ष” केवल अर्थशास्त्र का नहीं, बल्कि नैतिकता और न्याय का प्रश्न है।
    जब तक उत्पादन करने वाला व्यक्ति अपने परिश्रम का उचित फल नहीं पाएगा,
    तब तक समाज में असंतोष, असमानता और संघर्ष बना रहेगा।

    अतः समय की पुकार है —
    विकास नहीं, न्यायपूर्ण विकास।
    उत्पादन नहीं, समान वितरण।



  • साल 2017 की बात है।
    हम दोनों ने माता वैष्णो देवी के दर्शन का संकल्प लिया। दोपहर लगभग 2 बजे हम कटरा पहुंचे। योजना थी कि थोड़ा विश्राम लेकर शाम को चढ़ाई शुरू करेंगे, ताकि यात्रा का रोमांच भी बना रहे।

    शाम 7 बजे हमने पैदल यात्रा प्रारंभ की। शुरुआत में उत्साह चरम पर था, लेकिन 500 मीटर चलते ही शरीर ने थकान का संकेत देना शुरू कर दिया। मन में ख्याल आया — इतनी जल्दी थकान? अभी तो पूरी पहाड़ी बाकी है! तभी पिताजी का एक कथन याद आया

    “काम के बीच में रुकोगे तो थकान हावी हो जाएगी,
    काम पूरा होने पर ही विश्राम करो।”

    बस, उसी वाक्य ने नई ऊर्जा भर दी। हमने तय किया कि चाहे धीरे चलें, रुकेंगे नहीं

    शुरुआत में यात्रा पथ पर भीड़ थी, श्रद्धालुओं के जयकारों से वातावरण गूंज रहा था। पर जैसे-जैसे रात गहराने लगी, भीड़ छंटने लगी। एक समय ऐसा आया कि आगे-पीछे कोई नहीं — सिर्फ हम, पहाड़, और सन्नाटा।

    रात के लगभग एक बजे का समय था। ठंडी हवा के झोंके और पहाड़ों के बीच पसरा सन्नाटा मानो भीतर तक उतर गया।
    सिहरन सी दौड़ गई —
    कहीं जंगली जानवर न मिल जाएं,
    कहीं कोई असामाजिक व्यक्ति रास्ते में न हो,
    कहीं ऊपर से चट्टान न गिर पड़े…

    सड़क किनारे जगह-जगह चेतावनी के बोर्ड लगे थे — “यहां न रुकें, पत्थर गिरने का खतरा है।”
    हर कदम डर और आस्था के बीच की डोर पर था।

    लगभग तीन बजे एक छोटा सा कैफेटेरिया मिला।
    थकान से चूर शरीर को राहत मिली — हमने वहाँ बैठकर गरम चाय पी।
    वह चाय जैसे आत्मा तक उतर गई।

    थोड़ी देर बाद फिर यात्रा शुरू की।
    रात के अंधेरे को पार करते हुए जब सुबह की पहली किरणों ने पहाड़ों को सुनहरे रंग में रंग दिया,
    हम माता के दरबार के द्वार पर थे।

    सुबह के दर्शन के लिए लगने वाली पहली पंक्ति में हम खड़े थे
    शरीर भले थका था, पर मन में अद्भुत शांति थी —
    डर, थकान और रात की ठंड सब जैसे पीछे छूट गए थे।

    वह पल आज भी याद है —
    जब घंटियों की मधुर ध्वनि और “जय माता दी” के जयकारे के बीच
    मन में बस एक ही भाव था —
    “मां ने बुलाया था, और हमने बिना रुके पहुँच कर उनका आशीर्वाद पा लिया।”




  • ✍️ अजय कुमार सिंह

    सुबह के सात बजे होंगे। वार्ड की खिड़कियों से हल्की धूप झाँकने लगी थी। कमरे में दवा की गंध और मशीनों की बीप-बीप के बीच एक कमजोर-सी रोने की आवाज़ सुनाई दी — एक नवजात की, जो अभी-अभी इस दुनिया में आया था।

    पर उस रोने में जीवन की ऊर्जा नहीं थी, एक संघर्ष था।
    हर सांस उसके नन्हे से सीने में जैसे मुश्किल से ठहर रही थी।

    मैंने मॉनिटर की तरफ देखा — नंबर ऊपर-नीचे हो रहे थे।
    नर्सों की आंखों में चिंता थी, चेहरे पर बेचैनी।
    ऑक्सीजन दी गई, सक्शन किया गया, इंजेक्शन लगे — सब कुछ किया गया।
    पर बच्चे की छाती बार-बार ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे वह हर सांस को खींचने के लिए लड़ रहा हो।

    काफी कोशिशों के बाद मैंने धीमी आवाज़ में कहा —

    > “रेफरल बना दो… बच्चे को जिला अस्पताल भेजना पड़ेगा।”

    कागज़ पर कुछ शब्द लिखे गए, लेकिन उन शब्दों के पीछे बहुत कुछ था —
    एक डॉक्टर की जिम्मेदारी, एक पिता-सा दर्द, और एक इंसान की असहायता।

    थोड़ी देर बाद आशा वर्कर आई।
    उसने धीरे से कहा —

    > “साहब, बच्चे के घरवाले पूछ रहे हैं… अगर बच्चा बच सकता है तो जिला ले जाएँ।
    नहीं तो 108 ले जाकर वहीं छोड़ देंगी… क्योंकि वापसी का किराया नहीं है।
    गरीब आदमी हैं साहब… सौ-दो सौ भी नहीं है।”

    उस एक पल में सब कुछ ठहर गया।
    कमरा, आवाज़ें, घड़ी — सब जैसे रुक गए हों।

    मेरे भीतर एक गूंज उठी —
    हमारे “रेफरल” लिखने और उनके “फैसला करने” के बीच कितनी बड़ी खाई है।
    मेरे लिए यह एक मेडिकल निर्णय था,
    पर उस पिता के लिए यह उसकी पूरी दुनिया का फैसला था —
    बच्चे की जान या घर की रोटी?

    मैंने उसकी जगह खुद को रखने की कोशिश की।
    कल्पना की, कि मेरी गोद में मेरा बच्चा सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा है,
    और जेब में बस सौ रुपये हैं…
    ऐसे में क्या कोई भी पिता सही फैसला कर सकता है?

    मैं बाहर आया, बच्चे को देखा —
    उसकी छोटी-छोटी उंगलियाँ अब भी हिल रही थीं,
    जैसे ज़िन्दगी को पकड़ने की कोशिश कर रही हों।

    उस पल मुझे पहली बार एहसास हुआ —
    हमारे ये “सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र” कितने बड़े हैं।
    यह केवल ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं हैं,
    यह उन सैकड़ों गरीब परिवारों की पहली उम्मीद हैं।
    जो यहाँ इलाज नहीं, जीवन की संभावना लेकर आते हैं।

    हम हमेशा सबको नहीं बचा सकते,
    पर हर प्रयास, हर शब्द, हर निर्णय किसी की ज़िन्दगी बन सकता है।

    उस दिन मैंने सिर्फ एक बच्चे को नहीं देखा था —
    मैंने “जीवन की नाजुक डोर” को अपनी आंखों के सामने महसूस किया था।

    और तब जाना…
    एक सांस की कीमत कभी पैसों से नहीं आँकी जा सकती,
    वह उम्मीद, सेवा और करुणा से मापी जाती है।

    लेखक का दृष्टिकोण:

    इस घटना ने मुझे भीतर तक बदल दिया।
    पहले कभी सोचा नहीं था कि एक साधारण निर्णय — “रेफरल बना दो” —
    किसी परिवार के लिए इतना कठिन हो सकता है।
    पर उस दिन समझ आया कि
    स्वास्थ्य सेवा केवल इलाज नहीं, बल्कि संवेदना की सबसे ऊँची अभिव्यक्ति है।




  • जीवन की राह हमेशा सीधी नहीं होती।
    कभी यह पथरीली होती है, कभी फूलों से सजी,
    कभी धूप में तपाती है, तो कभी ठंडी छाँव देती है।
    पर एक बात हमेशा समान रहती है —
    चलते रहना।
    क्योंकि असल जीवन मंज़िल में नहीं,
    उस रास्ते में है जिसे हम तय करते हैं।



    🌿 मेरे संघर्ष की यात्रा
    🧒 बचपन का संघर्ष

    गाँव की पगडंडियों से शुरू हुआ मेरा सफर आसान नहीं था।
    कभी स्कूल पहुँचने के लिए मीलों पैदल चलना,
    कभी टिमटिमाती लालटेन की रोशनी में रात भर पढ़ाई —
    हर दिन एक परीक्षा थी।
    पर उस वक्त भी विश्वास था कि मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती।


    🏫 मेडिकल कॉलेज की लड़ाई

    जब मेडिकल कॉलेज पहुँचा, लगा कि अब मंज़िल पास है —
    पर असल में यह तो संघर्ष का नया अध्याय था।
    किताबों के ढेर, नींद से लड़ती आँखें,
    वार्ड में मरीजों की भीड़ और मन में लगातार चलती जिम्मेदारी।
    कभी लगा कि अब नहीं हो पाएगा,
    पर भीतर की आवाज़ कहती रही —
    थोड़ा और चलो, मंज़िल नहीं, यही रास्ता तुम्हें गढ़ रहा है।”


    🏥 नौकरी और नई चुनौतियाँ

    डिग्री मिली — लगा अब राहत मिलेगी,
    पर असल जीवन का असली इम्तहान तो अब शुरू हुआ था।
    सरकारी सेवा में कदम रखते ही नई जिम्मेदारियाँ,
    कभी संसाधनों की कमी, कभी रात-दिन ड्यूटी,
    कभी निर्णयों का बोझ और कभी प्रशासनिक दबाव।
    पर जब किसी मरीज की आँखों में विश्वास दिखता,
    तो थकान गायब हो जाती थी।
    यह भी संघर्ष था — पर यही सेवा की सच्ची साधना थी।


    🔁 संघर्ष सफलता संघर्ष

    जीवन ने यही सिखाया —
    कि संघर्ष कभी खत्म नहीं होता।
    हर सफलता एक नए संघर्ष का द्वार खोलती है।
    पहले पढ़ाई का संघर्ष था,
    फिर नौकरी पाने का,
    फिर जिम्मेदारियाँ निभाने का।
    पर यही तो जीवन का सार है —
    हर जीत के बाद एक नई चढ़ाई।
    अगर संघर्ष न हो, तो जीवन ठहर जाता है।
    और ठहराव, जीवन नहीं होता।


    🌸 रास्ते का आनंद लो

    अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ,
    तो समझ आता है कि वो सारे कठिन दिन ही
    मुझे मजबूत बनाने वाले थे।
    हर आँसू ने मुझे सहनशील बनाया,
    हर असफलता ने मुझे विनम्र बनाया।
    आज जो कुछ भी हूँ,
    वो उन संघर्षों की देन है जिन्होंने मुझे तोड़ा नहीं — गढ़ा है।


    अंत में…

    जीवन की असली सुंदरता मंज़िल में नहीं,
    बल्कि उस सफर में है जहाँ
    आपने गिरकर उठना सीखा,
    हारकर जीतना सीखा,
    और थककर भी मुस्कुराना सीखा।

    संघर्ष ही जीवन है,
    और मंज़िल तक पहुँचकर नहीं,
    बल्कि रास्ते में चलते हुए हम असली इंसान बनते हैं।”


     क्योंकि हर संघर्ष एक नई कहानी लिखता है।



  • मानव चेतना की यह अद्भुत यात्रा ‘भूत’ के भय से शुरू होती है, ‘भगवान’ में विश्वास पाती है, ‘विज्ञान’ के माध्यम से तर्क को अपनाती है और अंततः ‘अध्यात्म’ में स्वयं का अनुभव करती है। यह लेख इतिहास, दर्शन और जीवन की गहराइयों को जोड़ता है।

    🌿 भूमिका

    मनुष्य केवल एक जीव नहीं, बल्कि प्रश्न पूछने वाली चेतना है। उसकी यात्रा केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक है।
    प्राचीन जंगलों में भय से कांपता हुआ मानव, देवताओं के आगे नतमस्तक हुआ; फिर प्रयोगशालाओं में जाकर प्रकृति के रहस्यों को सुलझाया, और अंततः ध्यान की शांति में स्वयं को खोजने निकला।

    यह लेख इसी अनंत यात्रा की कहानी है —
    👉 भूत से भगवान,
    👉 भगवान से विज्ञान,
    👉 और विज्ञान से अध्यात्म तक…


    🌀 1. भूत से भगवान तक : भय से विश्वास का जन्म

    मानव इतिहास की सबसे पुरानी कहानियाँ न तो सभ्यता की हैं, न ही विज्ञान की — वे उस समय की हैं जब मनुष्य जंगलों में भटकता था, उसके पास न आग थी, न भाषा, न सुरक्षा के साधन। रात का अंधेरा उसे निगल जाने को तैयार लगता था, आकाश में गर्जन उसे कंपा देती थी और मृत्यु उसके लिए एक गहरी, अनजानी खाई थी।

    उस युग का मानव प्रकृति की शक्तियों के सामने नितांत असहाय था। हर झाड़ी में उसे किसी अदृश्य सत्ता की आहट सुनाई देती थी। पत्तों की फड़फड़ाहट, तूफ़ानों की गूँज और अंधकार — सब उसे किसी “भूत” की उपस्थिति लगते।

    धीरे-धीरे, इस भय ने ही आस्था का बीज बोया। उसने उन अनजानी शक्तियों को नाम और रूप देना शुरू किया — अग्नि को देवता बनाया, वर्षा को इंद्र कहा, मृत्यु को यम का रूप दिया।

    जहाँ वह कभी डरता था, वहीं अब वह उन शक्तियों को पूजने लगा — ताकि वे उसे बचाएँ। यह परिवर्तन केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहराई से मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विकास की शुरुआत थी।
    👉 भय से जन्मा यह विश्वास मानव चेतना की पहली छलांग थी — अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से श्रद्धा की ओर।


    🔱 2. भगवान से विज्ञान तक : प्रश्न करने की साहसिक छलांग

    जब मनुष्य ने भय को आस्था में रूपांतरित कर लिया, तब उसके भीतर ‘जानने’ की जिज्ञासा जागी।
    अब वह केवल मानने पर संतुष्ट नहीं था — वह समझना चाहता था।

    🌧 “बारिश क्यों होती है?”
    🌠 “तारे क्यों चमकते हैं?”
    💀 “बीमारियाँ क्यों फैलती हैं?”

    प्रारंभ में इन प्रश्नों का उत्तर धार्मिक कथाओं में खोजा गया। लेकिन कुछ जिज्ञासु मस्तिष्कों ने देखा कि प्रकृति में कुछ नियम बार-बार दोहराए जाते हैं। यहीं से विज्ञान की शुरुआत हुई — एक ऐसी क्रांति जिसने देवकथाओं की जगह अवलोकन, तर्क और प्रयोग को दिया।

    भारत में ऋषियों ने प्रश्न पूछे, यूनान में दार्शनिकों ने अवलोकन किया, और बाद में यूरोप के वैज्ञानिकों ने प्रयोगशालाओं में ब्रह्मांड को समझने के लिए संघर्ष किया।

    • बिजली अब देवता का क्रोध नहीं, बल्कि विद्युत प्रवाह समझी गई।
    • बीमारियाँ अब पाप की सज़ा नहीं, बल्कि जीवाणुओं और वायरसों की देन मानी गईं।
    • सूर्य अब देव रथ नहीं, बल्कि एक विशाल तारा माना गया।

    👉 विज्ञान ने भगवान को नकारा नहीं — उसने उस “अज्ञात” को “ज्ञात” करने की प्रक्रिया शुरू की।
    यह विश्वास से तर्क की, श्रद्धा से खोज की, और प्रार्थना से प्रयोग की यात्रा थी।


    🌌 3. विज्ञान से अध्यात्म तक : जानने से ‘होने’ की यात्रा

    प्रकृति को समझते-समझते मनुष्य ने अद्भुत प्रगति की — वह धरती के बंधनों को पार कर अंतरिक्ष में पहुँचा। लेकिन जैसे-जैसे बाहरी रहस्य सुलझे, एक नई खोज भीतर से सिर उठाने लगी।

    भौतिक ज्ञान बढ़ा, पर आत्मिक शांति कम हुई।
    विज्ञान ने बताया कि शरीर कैसे काम करता है, पर “मैं कौन हूँ?” का उत्तर नहीं दे सका।

    विज्ञान मस्तिष्क की रचना समझ सकता है, पर चेतना को नहीं माप सकता।
    वह भावनाओं की रासायनिक प्रक्रिया बता सकता है, पर प्रेम या करुणा के अनुभव को परिभाषित नहीं कर पाता।

    यहीं से अध्यात्म की यात्रा शुरू होती है — जहाँ उद्देश्य जानना नहीं, होना होता है।
    ध्यान, योग, मौन, आत्मचिंतन — ये सभी वे साधन हैं जिनसे मानव अपने भीतर के गहरे साक्षी को देखने की कोशिश करता है।

    👉 विज्ञान बाहर की आँख खोलता है,
    👉 अध्यात्म भीतर की आँख।

    भारतीय परंपरा में यह ज्ञान बहुत प्राचीन है —
    “यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे” — जैसे भीतर है, वैसा ही बाहर।

    जब बुद्धि की समझ अनुभव में बदलती है, तभी सच्चा अध्यात्म जन्म लेता है। यह यात्रा मनुष्य को यह एहसास कराती है कि वह ब्रह्मांड से अलग नहीं — वही ब्रह्मांड है।


    समापन : मानवता की एकीकृत यात्रा

    भूत → भगवान → विज्ञान → अध्यात्म — यह क्रम केवल ऐतिहासिक नहीं, चेतना की परतों की कहानी है।

    • भूत ने भय दिया,
    • भगवान ने विश्वास दिया,
    • विज्ञान ने ज्ञान और शक्ति दी,
    • अध्यात्म ने स्वयं का साक्षात्कार दिया।

    👉 यह यात्रा अभी समाप्त नहीं हुई — बल्कि अब यह और गहरी होने लगी है।
    मानवता का भविष्य शायद उसी में निहित है जहाँ विज्ञान और अध्यात्म साथ चलें — एक बाहर की सच्चाई को समझे, दूसरा भीतर की।

    🕊 यही मानव चेतना की अनंत यात्रा है — बाहर से भीतर, अंधकार से प्रकाश, और ज्ञान से अनुभव की ओर। 🌿




  • ✍️ — एक साहित्यिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण से

    संसार एक विशाल दर्पण है — मौन, परंतु सजीव। वह हमारी प्रत्येक भावना, प्रत्येक विचार और प्रत्येक कर्म को अपने हृदय में संजो लेता है, जैसे कोई झील आकाश के हर बादल को अपनी गोद में समेट लेती है। और फिर एक दिन, वही झील हमारी ही छवि को हमें लौटा देती है… कभी लहरों में, कभी नीरवता में।

    1. विचारों की अनुगूँज — जब मन ब्रह्मांड से संवाद करता है

    विचार मात्र मस्तिष्क की उपज नहीं, वे ब्रह्मांड की भाषा हैं। हमारे मन की हर तरंग किसी अदृश्य दिशा में उड़ान भरती है और समय के किसी कोने में प्रतिध्वनित होकर लौट आती है।

    जब हम प्रेम, करुणा और प्रकाश के विचार बुनते हैं, तो ये विचार ब्रह्मांड की गोद में अंकुरित होते हैं और एक दिन मधुर फल बनकर हमारे जीवन में झरने लगते हैं।
    परंतु यदि हम संशय, कटुता और शिकायत के बीज बोते हैं, तो वही बीज जीवन की धरती पर काँटों का वन बनकर उगते हैं।

    “जो मन से प्रसारित होता है, वही जीवन में प्रतिफलित होता है।”

    2. कर्म — भविष्य के बीज

    किसान बीज बोता है, और ऋतु के अनुसार फसल काटता है। जीवन भी कुछ ऐसा ही है। हमारे कर्म ही हमारे भविष्य की फसल के बीज हैं।
    यदि हमने किसी के आँसुओं को पोछा है, तो ब्रह्मांड किसी और दिन हमारे आँसू पोंछने के लिए किसी को भेज देगा।
    यदि हमने किसी के पथ में दीपक जलाया है, तो वही प्रकाश किसी मोड़ पर हमारे अंधेरे को रौशन करेगा।

    इसलिए कर्म करते समय यह न भूलें — ब्रह्मांड कुछ नहीं भूलता।

    3. शब्द — हवा में उड़ते नहीं, हृदयों में उतरते हैं

    कहा गया है — “वचन बाण के समान होते हैं, एक बार छूट जाएँ तो लौटते नहीं।”
    हमारे बोले हुए शब्द हवा में विलीन नहीं होते, वे ऊर्जा बनकर गूँजते रहते हैं। किसी के लिए निकली सच्ची दुआ समय के किसी मोड़ पर अप्रत्याशित आशीर्वाद बनकर लौटती है। और कटु वचन, किसी अनजाने क्षण में हमारे अपने हृदय को आहत करते हुए प्रतिध्वनि बनकर लौटते हैं।

    इसलिए बोलते समय ऐसा महसूस करें मानो ब्रह्मांड स्वयं सुन रहा हो।
    4. संसार — एक प्रतिध्वनि करता हुआ ब्रह्मांड

    हम संसार को जैसे देखते हैं, संसार हमें वैसा ही दिखाई देता है।
    यदि आँखों में करुणा है तो हर चेहरा अपना लगता है, यदि दृष्टि में संदेह है तो अपना भी पराया प्रतीत होता है। ब्रह्मांड हमारी ही भावनाओं को लेकर हमें वापस लौटा देता है, मानो कह रहा हो — “तुम जैसा संसार बनाओगे, वैसा ही संसार तुम्हारे लिए रचा जाएगा।”

    > ✨ “जीवन एक प्रतिध्वनि है — जो दोगे, वही गूँज बनकर लौटेगा।”

    5. देने की निःस्वार्थता — सबसे बड़ा धन

    देने का आनंद लेने के आनंद से कहीं बड़ा है। प्रेम बाँटने से वह घटता नहीं, बल्कि बढ़ता है। दया करने से व्यक्ति छोटा नहीं होता, वह विराट हो जाता है।

    चाहे वह मुस्कान हो, शब्दों का स्नेह, ज्ञान का प्रकाश या समय का अमूल्य उपहार — जब हम बिना किसी अपेक्षा के संसार को कुछ देते हैं, तो वही ब्रह्मांड अपनी उदार हथेलियों से कई गुना कर के हमें लौटाता है।

    ✨ उपसंहार — जीवन का गुप्त रहस्य

    जीवन का रहस्य किसी पर्वत की गुफा में नहीं छिपा, वह तो हमारी अपनी दृष्टि, वाणी और कर्म में छिपा है।
    यदि हम चाहें, तो संसार को एक बगीचे में बदल सकते हैं — बस हमें अपने भीतर प्रेम के बीज बोने होंगे, अपने शब्दों को जल बनाना होगा और अपने कर्मों से धूप देना होगा।

    “हम जो संसार को देते हैं, वही संसार हमें लौटाता है — कभी प्रत्यक्ष, कभी गूढ़ रूप में।”



  • सुबह के आठ बजे रवि अपनी पुरानी कार में ऑफिस की ओर निकलता है। गाड़ी कोई बहुत शानदार नहीं, लेकिन उसे चलाते समय उसके चेहरे पर एक अजीब-सी गंभीरता होती है — जैसे हर मोड़ के साथ कोई नया विचार उसके मन में दस्तक दे रहा हो।

    रवि सरकारी विभाग में एक अधिकारी है। न बहुत बड़ा, न बहुत छोटा।
    लोग उसे “साहब” कहकर संबोधित करते हैं, लेकिन वह जानता है — ये कुर्सी उतनी ताकतवर नहीं जितनी दिखती है। ऊपर के अफसरों के आदेश, नीचे के कर्मचारियों की उम्मीदें… और बीच में वह — एक दबे स्वर वाला इंसान जो सही और गलत के बीच रोज़ फँसा रहता है।

    युवा उम्र में उसने सपना देखा था — एक दिन वो बड़ा अधिकारी बनेगा, लोगों की भीड़ में उसका नाम होगा, सम्मान और प्रभाव दोनों उसके कदमों में होंगे। लेकिन ज़िंदगी का रास्ता वैसा सीधा नहीं निकला। मेहनत की, परीक्षा दी, नौकरी मिली… मगर ऊँचाइयाँ उतनी नहीं मिलीं जितनी उसने सपनों में गढ़ी थीं।

    ऑफिस पहुँचते ही फ़ाइलों का ढेर उसका इंतज़ार करता है। कभी किसी के प्रमोशन की फाइल, कभी किसी की शिकायत, तो कभी ऊपर से आया हुआ दबाव। वो आदेशों पर हस्ताक्षर तो करता है, लेकिन कई बार उसके भीतर से आवाज़ आती है —
    “क्या मैं अपने सिद्धांतों के साथ खड़ा हूँ या हालात के सामने झुक गया हूँ?”

    कई बार बॉस के सामने उसकी बातें दब जाती हैं। वो जानता है कि कई फैसले गलत हैं, लेकिन विरोध करने की हिम्मत जुटा नहीं पाता। कुर्सी पर बैठा उसका चेहरा गंभीर होता है, पर भीतर गहरी बेचैनी होती है।

    शाम को कार में लौटते हुए वो अक्सर शीशे में अपना चेहरा देखता —
    “क्या मैं वो बन रहा हूँ जो मैं बनना चाहता था?”
    “बड़ा अधिकारी बनना था… पर क्या मैंने बड़ा इंसान बनने की कोशिश की?”

    रात में वह छत पर टहलते हुए आसमान को निहारता।
    सपने अब भी वही हैं — एक दिन कुछ बड़ा करेगा, अपने परिवार को वो ज़िंदगी देगा जिसकी उसने कल्पना की थी।
    लेकिन अब उन सपनों के साथ एक गहरी समझ भी जुड़ गई है — कि बड़ा बनना सिर्फ कुर्सी का मामला नहीं… दिल और हिम्मत का भी होता है।

    उसका जीवन न पूरी तरह सफल था, न असफल। वो उन करोड़ों लोगों जैसा था जो मध्यम पदों पर बैठकर भी अंदर ही अंदर बड़े सपनों को सीने में सहेज कर रखते हैं…
    जिनके भीतर हर दिन एक द्वंद्व चलता है — “जो हूँ” और “जो बनना चाहता हूँ” के बीच।

     यह कहानी न किसी नायक की है, न किसी विजेता की…
    यह एक आम आदमी के असली भावनात्मक संघर्ष की कहानी है — जो बाहर से अधिकारी है, और अंदर से एक स्वप्नदर्शी। 



  • 🌸 “आई लव यू पापा” — एक छोटी सी पर्ची, बड़े एहसास

    शाम का समय था। रोज़ की तरह मैं अपने क्लिनिक से लौटकर घर आया। थका हुआ शरीर, दिनभर की भागदौड़, मरीजों की चिंता — सब साथ में लिए। जैसे ही घर में कदम रखा, मेरी नज़र अचानक मेरी 5 साल की बेटी गिन्नी पर पड़ी।

    वो एक कोने में चुपचाप बैठी थी और मेरे पर्स में कुछ कर रही थी।
    मैंने हैरानी से सोचा — “गिन्नी तो कभी पैसों के पास भी नहीं जाती, आखिर पर्स में क्या कर रही है?”

    मैं धीरे से पास गया और पूछा —
    “गिन्नी, पापा का पर्स में क्या कर रही हो बेटा?”

    वो झट से बोली — “कुछ नहीं पापा…”
    चेहरे पर मासूमियत और आँखों में हल्की-सी झिझक थी।

    मैं मुस्कुराया लेकिन प्यार से समझाया —
    “बेटा, पर्स को मत छुआ करो। मैं रोज़ मरीजों को देखने जाता हूँ, कई बार बिना हाथ धोए पर्स छू लेता हूँ। नोट भी साफ नहीं होते। इससे बीमारी लग सकती है।”

    गिन्नी ने गंभीरता से सिर हिलाया —
    “ठीक है पापा…”
    और फिर अपनी गुड़ियों की दुनिया में लौट गई।

    दिन यूं ही बीत गया।
    शाम को किसी ज़रूरी काम के लिए मैंने पर्स खोला… तो एक छोटा-सा मुड़ा-तुड़ा कागज़ नज़र आया।

    थोड़ा हैरान होकर उसे निकाला और खोला —
    अगले ही पल मेरी आँखें नम हो गईं।
    उसमें नन्हे, टेढ़े-मेढ़े अक्षरों में लिखा था —

    ✨ “I Love You Papa” ✨

    बस… उस पल जैसे समय ठहर गया।
    दिनभर की थकान, काम का तनाव, सब कुछ एक ही झटके में गायब हो गया।
    उस कागज़ के टुकड़े में न कोई हीरे थे, न सोना… लेकिन उसमें एक नन्ही बेटी का सच्चा, निश्छल और गहरा प्यार छिपा था।

    मैंने पर्ची को सीने से लगाया और मन ही मन कहा —
    “बेटा, तू नहीं जानती… तेरे इन तीन शब्दों ने मुझे आज दुनिया का सबसे अमीर इंसान बना दिया है।”



    💖 समापन:

    कभी-कभी ज़िंदगी की सबसे बड़ी खुशियाँ बड़े तोहफों में नहीं, बल्कि एक छोटे से “आई लव यू पापा” में छिपी होती हैं।
    यह भावनाएँ समय के साथ पुरानी नहीं होतीं — बल्कि हमारे दिल में हमेशा के लिए एक गर्माहट भरी याद बनकर बस जाती हैं।



  • एक दिन शाम को जब सूरज ढल रहा था, हम गाड़ी से बाज़ार की ओर जा रहे थे। रास्ते के किनारे कुछ टेंट लगे हुए थे — पुराने कपड़ों और प्लास्टिक की चादरों से बने अस्थायी घर। बाहर कुछ लोग बैठे बांस की टोकरी बना रहे थे, कुछ पत्थरों पर छैनी-हथौड़ी से मूर्तियाँ गढ़ रहे थे, और कुछ बच्चे पास ही खेल रहे थे।

    शानविका ने उन झुग्गियों की ओर इशारा करते हुए पूछा,
    “पापा, ये लोग यहाँ सड़क के किनारे क्यों रहते हैं?”

    मैंने हल्के से कहा,
    “क्योंकि बेटा, ये लोग गरीब हैं… इनके पास अपना घर नहीं है।”

    उसने तुरंत अगला सवाल किया,
    “गरीब क्यों हैं? घर क्यों नहीं है?”

    थोड़ा सोचकर मैंने जवाब दिया,
    “क्योंकि शायद ये लोग काम नहीं करते…”

    लेकिन शानविका ने मासूमियत और गहराई भरी नज़रों से मेरी ओर देखा और बोली,
    “लेकिन पापा, हम तो जब भी इन्हें देखते हैं, ये तो कुछ न कुछ करते ही रहते हैं — कोई टोकरी बना रहा है, कोई पत्थर की मूर्तियाँ गढ़ रहा है… तो क्या इनके काम का मूल्य नहीं मिलता? लोग इनके काम का मूल्य क्यों नहीं देते?”

    उसके सवालों ने मुझे कुछ क्षणों के लिए मौन कर दिया। छोटी सी उम्र में इतने गहरे प्रश्नों का सरल उत्तर देना आसान नहीं था। इसलिए मैंने टालने की कोशिश में कहा,
    “जब तुम बड़ी हो जाओगी, तब समझोगी बेटा…”

    पर वह रुकने वाली कहाँ थी। उसने आत्मविश्वास से कहा,
    “पापा, मैं बताती हूँ… क्योंकि लोग इनका सामान नहीं लेते। कंपनी में बना सामान सस्ता होता है, इसलिए लोग वही खरीद लेते हैं। मजबूरी में ये लोग भी अपना सामान सस्ता बेचते हैं, इसलिए ये गरीब रह जाते हैं।”

    उसकी बात सुनकर मैं चुप हो गया। एक छोटी बच्ची ने वह सच्चाई बड़ी सहजता से कह दी, जिसे कई बड़े-बड़े लोग भी अनदेखा कर देते हैं।

    रास्ते पर चलते-चलते मेरे मन में एक विचार गूंजता रहा —
    👉 “शायद हम सब, अनजाने में ही सही, उनकी गरीबी में कहीं न कहीं भागीदार हैं…”

    उस दिन शानविका ने मुझे सिखाया कि हर सवाल का जवाब उम्र से नहीं, संवेदना से आता है।


    ✨ कहानी का संदेश:

    कभी-कभी बच्चे हमारे भीतर सोई संवेदनाओं को जगा देते हैं। समाज में हर मेहनतकश को उसका उचित मूल्य मिले, यह हमारी जिम्मेदारी भी है। जब हम स्थानीय कामगारों का सामान खरीदते हैं, तब न सिर्फ हम उनका हौसला बढ़ाते हैं, बल्कि एक बेहतर समाज के निर्माण में भी अपना योगदान देते हैं।



  • कभी चिकित्सा को “ईश्वर का कार्य” कहा जाता था। चिकित्सक को ‘भगवान का रूप’ माना जाता था — क्योंकि वह जीवनदाता था, वह पीड़ा मिटाने वाला था, वह आशा का अंतिम सहारा था। लेकिन आज परिस्थितियां बदल गई हैं। समय के साथ चिकित्सा सेवा का स्वरूप भी धीरे-धीरे परिवर्तित होता चला गया है। सेवा की भावना जहाँ कभी केंद्र में होती थी, वहीं अब “पेशा” और “लाभ” ने उसकी जगह लेना शुरू कर दिया है।

    🧾 सेवा से अधिक व्यवसाय

    आज चिकित्सा क्षेत्र में प्रवेश करने वाले कई लोगों का प्राथमिक उद्देश्य मानवीय सेवा से अधिक आर्थिक सफलता और सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करना हो गया है। मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश की ऊँची फीस, महंगे अस्पतालों का संचालन, और अत्याधुनिक उपकरणों पर भारी निवेश — इन सबने चिकित्सा को एक महंगे व्यवसाय का रूप दे दिया है। स्वाभाविक रूप से जब प्रवेश व्यवसायिक आधार पर होगा, तो दृष्टिकोण भी व्यवसायिक हो जाएगा।

    🧍‍♂️ डॉक्टर–रोगी संबंधों में आई दूरी

    पहले डॉक्टर और मरीज का संबंध केवल उपचार तक सीमित नहीं होता था, उसमें भावनाएं, विश्वास और आत्मीयता शामिल होती थी। लेकिन अब यह रिश्ता अक्सर एक “सेवा प्रदाता” और “ग्राहक” के रूप में सीमित होकर रह गया है। परामर्श शुल्क, अनावश्यक जांच, महंगे उपचार पैकेज और समय की कमी ने इस संबंध की आत्मा को कहीं न कहीं आहत किया है।

    📉 गिरता सामाजिक सम्मान

    जब चिकित्सा क्षेत्र में व्यवसायिकता हावी होती है, तो समाज का नज़रिया भी बदलने लगता है। जहाँ पहले चिकित्सक को निःस्वार्थ सेवाभाव के लिए आदर मिलता था, वहीं अब आम लोगों में संदेह, असंतोष और अविश्वास की भावना बढ़ने लगी है। चिकित्सकीय लापरवाही के मामले, अत्यधिक बिलिंग और “कमाई के साधन” जैसे दृष्टिकोण ने डॉक्टरों की सामाजिक प्रतिष्ठा को प्रभावित किया है।

    ✨ आवश्यक है पुनः सेवा की भावना को केंद्र में लाना

    चिकित्सा क्षेत्र का व्यवसायिक रूप लेना पूर्णतः गलत नहीं है, क्योंकि इसमें संसाधन, तकनीक और समय की भारी लागत होती है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब सेवा का स्थान लाभ सर्वोपरि ले लेता है। यदि चिकित्सक फिर से अपने पेशे में मानवीय संवेदनाओं को प्राथमिकता दें, रोगी के साथ विश्वास का रिश्ता बनाएं और समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व को समझें, तो वह सम्मान फिर से लौट सकता है, जो कभी चिकित्सा पेशे की पहचान था।


    📝 समापन

    चिकित्सा का उद्देश्य केवल रोग का उपचार नहीं, बल्कि मनुष्य में आशा, विश्वास और जीवन के प्रति प्रेम जगाना भी है। जब तक चिकित्सा सेवा में यह भाव वापस नहीं आता, तब तक चिकित्सकों का सम्मान समाज में पुनः स्थापित होना कठिन रहेगा। इसलिए आज आवश्यकता है कि चिकित्सा को केवल पेशा नहीं, एक मानवीय सेवा के रूप में पुनः स्थापित किया जाए।