अजय ब्लॉग-अनुभव और अभिव्यक्ति

“अनुभव, विचार और कहानियों का संगम”

✍️ डा.अजय कुमार सिंह


🌾 प्रस्तावना

मानव सभ्यता की यात्रा उत्पादन के साथ शुरू हुई — बीज बोने से लेकर मशीन चलाने तक। किंतु जब से मनुष्य ने अपनी जरूरत से अधिक उत्पादन करना शुरू किया, तभी से “उत्पादन अधिशेष” (Surplus Production) की कहानी शुरू हुई।
यही अधिशेष समाज के विकास का आधार भी बना और संघर्ष का कारण भी।


⚙️ उत्पादन अधिशेष क्या है?

जब कोई समाज अपनी मूलभूत जरूरतों — जैसे भोजन, वस्त्र, आश्रय आदि — से अधिक उत्पादन करने लगता है, तो उस अतिरिक्त हिस्से को उत्पादन अधिशेष कहा जाता है।
यह अधिशेष ही व्यापार, कर, पूंजी संचय और सत्ता की नींव बनता है।
पर सवाल यह है कि — इस अधिशेष का मालिक कौन?


⚖️ संघर्ष की जड़ : अधिशेष पर अधिकार

इतिहास बताता है कि सभ्यताओं के विकास के साथ-साथ यह प्रश्न गहराता गया —
“जो उत्पादन करता है, वही उसका स्वामी क्यों नहीं होता?”

  • किसान अनाज उगाता है, पर अनाज का मूल्य बाजार तय करता है।
  • मजदूर फैक्ट्री में श्रम करता है, पर मुनाफा पूंजीपति ले जाता है।
  • संसाधन जनता के होते हैं, पर उनका उपयोग नीति-निर्माता तय करते हैं।

यही विरोधाभास उत्पादन अधिशेष के संघर्ष की जड़ है।


💰 पूंजीवाद और अधिशेष का केंद्रीकरण

औद्योगिक क्रांति के बाद यह संघर्ष और तीव्र हुआ।
मशीनों ने उत्पादन को कई गुना बढ़ाया, लेकिन अधिशेष का बड़ा हिस्सा पूंजीपति वर्ग के हाथों में सिमट गया।
मजदूर वर्ग केवल “वेतन” के रूप में अपनी जीविका भर पाता रहा, जबकि शेष लाभ — यानी अधिशेष — मालिक की तिजोरी में जाता रहा।

यह वही समय था जब मार्क्स ने कहा —

“पूंजी, श्रम के शोषण से उत्पन्न अधिशेष मूल्य का संचय है।”


🧑‍🌾 भारत का संदर्भ

भारतीय कृषि व्यवस्था में भी यही विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है।
किसान अपनी जमीन, पसीने और समय का निवेश करता है, पर उसका लाभ बिचौलिये, व्यापारी और बड़ी कंपनियाँ उठा लेती हैं।
उत्पादन अधिशेष का मूल्य किसान के हाथ में नहीं, बाजार के हाथ में होता है।

ग्रामीण भारत में यह संघर्ष आज भी जीवित है —
एक ओर उत्पादन है, दूसरी ओर मूल्यहीनता।


🌍 वैश्विक परिप्रेक्ष्य

आज विश्व अर्थव्यवस्था “उत्पादन अधिशेष” पर टिकी है।
जो देश अधिक उत्पादन करते हैं, वे शक्ति संपन्न कहलाते हैं।
जो देश उपभोग करते हैं, वे ऋणग्रस्त और आश्रित बनते जाते हैं।
परंतु विकास की इस दौड़ में प्रकृति और मानव — दोनों ही शोषित हो रहे हैं।

अधिशेष बढ़ा है, पर संतुलन घटा है।


🕊️ समाधान : संतुलन और न्याय

उत्पादन अधिशेष का संघर्ष तभी समाप्त हो सकता है जब —

  1. उत्पादक को उचित मूल्य मिले
  2. अधिशेष का न्यायपूर्ण वितरण हो
  3. संसाधनों का उपयोग सतत् और संतुलित रूप से किया जाए
  4. नीति और नैतिकता का समन्वय हो

विकास तभी सार्थक है जब वह सबके श्रम का सम्मान करे।


✨ निष्कर्ष

“उत्पादन अधिशेष का संघर्ष” केवल अर्थशास्त्र का नहीं, बल्कि नैतिकता और न्याय का प्रश्न है।
जब तक उत्पादन करने वाला व्यक्ति अपने परिश्रम का उचित फल नहीं पाएगा,
तब तक समाज में असंतोष, असमानता और संघर्ष बना रहेगा।

अतः समय की पुकार है —
विकास नहीं, न्यायपूर्ण विकास।
उत्पादन नहीं, समान वितरण।

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