
✍️ अजय कुमार सिंह
सुबह के सात बजे होंगे। वार्ड की खिड़कियों से हल्की धूप झाँकने लगी थी। कमरे में दवा की गंध और मशीनों की बीप-बीप के बीच एक कमजोर-सी रोने की आवाज़ सुनाई दी — एक नवजात की, जो अभी-अभी इस दुनिया में आया था।
पर उस रोने में जीवन की ऊर्जा नहीं थी, एक संघर्ष था।
हर सांस उसके नन्हे से सीने में जैसे मुश्किल से ठहर रही थी।
मैंने मॉनिटर की तरफ देखा — नंबर ऊपर-नीचे हो रहे थे।
नर्सों की आंखों में चिंता थी, चेहरे पर बेचैनी।
ऑक्सीजन दी गई, सक्शन किया गया, इंजेक्शन लगे — सब कुछ किया गया।
पर बच्चे की छाती बार-बार ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे वह हर सांस को खींचने के लिए लड़ रहा हो।
काफी कोशिशों के बाद मैंने धीमी आवाज़ में कहा —
> “रेफरल बना दो… बच्चे को जिला अस्पताल भेजना पड़ेगा।”
कागज़ पर कुछ शब्द लिखे गए, लेकिन उन शब्दों के पीछे बहुत कुछ था —
एक डॉक्टर की जिम्मेदारी, एक पिता-सा दर्द, और एक इंसान की असहायता।
थोड़ी देर बाद आशा वर्कर आई।
उसने धीरे से कहा —
> “साहब, बच्चे के घरवाले पूछ रहे हैं… अगर बच्चा बच सकता है तो जिला ले जाएँ।
नहीं तो 108 ले जाकर वहीं छोड़ देंगी… क्योंकि वापसी का किराया नहीं है।
गरीब आदमी हैं साहब… सौ-दो सौ भी नहीं है।”
उस एक पल में सब कुछ ठहर गया।
कमरा, आवाज़ें, घड़ी — सब जैसे रुक गए हों।
मेरे भीतर एक गूंज उठी —
हमारे “रेफरल” लिखने और उनके “फैसला करने” के बीच कितनी बड़ी खाई है।
मेरे लिए यह एक मेडिकल निर्णय था,
पर उस पिता के लिए यह उसकी पूरी दुनिया का फैसला था —
बच्चे की जान या घर की रोटी?
मैंने उसकी जगह खुद को रखने की कोशिश की।
कल्पना की, कि मेरी गोद में मेरा बच्चा सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहा है,
और जेब में बस सौ रुपये हैं…
ऐसे में क्या कोई भी पिता सही फैसला कर सकता है?
मैं बाहर आया, बच्चे को देखा —
उसकी छोटी-छोटी उंगलियाँ अब भी हिल रही थीं,
जैसे ज़िन्दगी को पकड़ने की कोशिश कर रही हों।
उस पल मुझे पहली बार एहसास हुआ —
हमारे ये “सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र” कितने बड़े हैं।
यह केवल ईंट-पत्थर की इमारतें नहीं हैं,
यह उन सैकड़ों गरीब परिवारों की पहली उम्मीद हैं।
जो यहाँ इलाज नहीं, जीवन की संभावना लेकर आते हैं।
हम हमेशा सबको नहीं बचा सकते,
पर हर प्रयास, हर शब्द, हर निर्णय किसी की ज़िन्दगी बन सकता है।
उस दिन मैंने सिर्फ एक बच्चे को नहीं देखा था —
मैंने “जीवन की नाजुक डोर” को अपनी आंखों के सामने महसूस किया था।
और तब जाना…
एक सांस की कीमत कभी पैसों से नहीं आँकी जा सकती,
वह उम्मीद, सेवा और करुणा से मापी जाती है।
—
लेखक का दृष्टिकोण:
इस घटना ने मुझे भीतर तक बदल दिया।
पहले कभी सोचा नहीं था कि एक साधारण निर्णय — “रेफरल बना दो” —
किसी परिवार के लिए इतना कठिन हो सकता है।
पर उस दिन समझ आया कि
स्वास्थ्य सेवा केवल इलाज नहीं, बल्कि संवेदना की सबसे ऊँची अभिव्यक्ति है।
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